राजू सिन्धी कुल्फीवाला

जब हम बच्चे होते हैं तब हमें ये मालूम नहीं होता कि हम अपने जीवन के कितने अनमोल पल जी रहे हैं. हम बस उन पलों को जी रहे होते हैं बिना इस बात को जाने कि बड़े होने पर यही पल हमें याद आ आकर हंसाएंगे, गुदगुदाएंगे, रुलाएंगे. ऐसा ही हमारा बचपन बीता था. बिना किसी बात की चिंता के. कोई काम की चिंता नहीं, कोई पैसों की चिंता नहीं, न दिन की टेंशन न रात की टेंशन. जो थोड़ा बहुत स्कूल से होमवर्क मिलता उसे सब मिलकर जल्दी से जल्दी निपटाने की प्रतियोगिता करते थे. खेलने की जल्दी जो रहती थी. गर्मी हो या सर्दी, खेलने के लिए कभी आड़े नहीं आती.

बड़ी बहन और बड़े चाचा के दोनों लड़कों के साथ हमारी चौकड़ी रहती थी. कभी बुआ आती थी तो उनके लड़कों के साथ दिनभर खेलते थे. हमें छोटे दोनों चाचा बहुत डांट लगाते रहते पर हम कहां मानते थे. उनके नजरों से ओझल होते ही फिर लग जाते थे. गिल्ली डंडा, आईस पाईस, हाथ लगाई, पीठू, मारदड़ी, घूता लाठी, कुरां-कुरां, चोर सिपाही ये हमारे रेगुलर खेल थे.

गर्मियों की छुट्टियों में भरी दुपहरी में जब सब घरवाले सोते रहते थे तब हम खेलते रहते थे. और इस बीच अगर कहीं पोंपी… पोंपी की आवाज सुनाई दे जाती तो सब ”राजू आ गया कुल्फी वाला” आवाज लगाते हुए दौड़ जाते उसकी तरफ. किसी के हाथ में पुरानी कापियां, किसी के हाथ में खाली बोतल, किसी के हाथ में पैसा रहता, कोई पुराना लौह कबाड़ चुनकर रखता उसके लिए.

उसका नाम राजू सिंधी था. 22 किलोमीटर दूर नोहर कस्बे से वह सुबह 9 बजे की बस से हमारे गांव बिरकाली आ जाता और यहां दिनभर गांव में घूमकर सामान बेचकर शाम 5 बजे की बस से वापस नोहर चला जाता. वह एक पुरानी साईकिल पर पीछे कैरियर पर कुल्फी का बड़ा बॉक्स जो वह कस्बे से ही लेकर आता था, साईकिल के टायर की ट्यूब से बांध लेता था. दिनभर वह पूरे गांव में पैदल घूमकर कुल्फी बेचता था. जब से हमने उसको देखा था तब से लेकर बड़े होने तक वह उसी साईकिल पर गर्मियों में कुल्फी बेचा करता था. सर्दियों में प्लास्टिक का सामान, कुछ स्टील के बरतन बेचता था. बदले में ज्यादातर उसे कबाड़ ही मिलता था. आमदनी पता नहीं कितनी होती थी पर आज भी जब मैं गांव जाता हूं तो उसको उसी तरह साईकिल पर कुल्फी बेचते हुए पाता हूं. इससे इतना तो अनुमान लगा ही लेता हूं कि 20 साल तक वह इसी तरह अपने परिवार का पेट पालता आ रहा है. हालांकि उसका नोहर कस्बे में स्थित घर देखकर कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि वह साईकिल पर कुल्फी बेचता है फेरी लगाकर. बच्चे भी बढिया तरीके से पढ लिख रहे हैं. बस खुद की जिन्दगी में कोई परिवर्तन नहीं होने दिया अब तक.

बचपन का भी अपना मजा होता है. शरारतें तो खून में रहती थी. जैसे ही मौका मिलता, शरारतें करने के लिए कोई न कोई मिल ही जाता था. और शरारत करने के लिए राजू कुल्फीवाला मिल जाए तो कहना ही क्या. वैसे भी उसे चिढाने का हम कोई मौका छोड़ते नहीं थे. राजू के पिताजी का नाम मूलाराम था और हम सब उसे ‘मूळे का बीज’ (मूली/मूळी का पुल्लिंग मूला/मूळा) कहते थे. हमारे ऐसा कहकर चिढाने पर वह छड़ी लेकर हमारे पीछे दौड़ता था. तब तक पीछे से एक दो कुल्फी उसकी पेटी से पार हो जाती. वह बड़बड़ाकर पता नहीं क्या क्या कहता रहता और हम हंसते रहते अपनी शारारत की सफलता पर.

एक बार मुझे दस रुपये का आधा फटा नोट मिला जिसका आधा हिस्सा गायब था. आधा था तो क्या हुआ, था तो दस का नोट ही, मैंने उठा लिया. दस रूपये की कीमत तब आज से पांच गुना थी. यानि दस रुपये की तब दस कुल्फी आ जाती थी पर आज तो दो ही आती है. मैंने इस पर विचार करना शुरू कर दिया कि इसका क्या उपयोग किया जा सकता है. आधा नोट तो कोई भी नहीं लेगा. मोड़कर दूंगा किसी को तो भी वह सीधा करेगा तो असलियत सामने आ जाएगी. कुछ ना कुछ तो जुगाड़ लगाना पड़ेगा.
फिर शातिर दिमाग में धांसू आयडिया आया. घर में अपनी पर्सनल तिजौरी में भारतीय मनोरंजन बैंक का चूर्ण की पुड़िया में निकला हुआ दस का नोट पड़ा था. तुरन्त ही आधे दस के नोट को पूरा करने के अभियान में जुट गया. पहले तो दोनों नोट के साइज का मिलान किया. फिर आधा नोट कट करके जो थोड़ा ओवर साइज था उसे काट कर मिलाया. अब परेशानी ये थी कि असली नोट पुराना था और मनोरंजन वाला नया कड़क. नये को पुराने में मिलाने के लिए मैंने उसे तेल में डुबोकर सुखाया जिससे दोनों का रंग मटमैला जैसा हो गया और फिर नये को मुट्ठी में लेकर भींच दिया इससे उसमें सलवटें भी पड़ गयी. अब दोनों में अंतर बहुत कम रह गया था. अब मैंने दोनों को बीच से गोंद से चिपकाकर धूप में सुखा दिया. सूखने के बाद नोट को देखा तो निश्चिंत हो गया कि राजू इस नोट की कुल्फी देने से इंकार नहीं कर सकेगा. अब मेरे कान बस एक ही आवाज सुनना चाह रहे थे…पों…पी… पों..पी…की आवाज.

दोपहर को आखिरकार वह आवाज सुनाई दे ही गयी गली में. जेब में रखे दस के खरे नोट को महसूस करता हुआ बाहर गली में भागा. राजू कुल्फीवाला गर्मी में पसीना पोंछते हुए आ रहा था. साईकिल के हैंडल पर बंधी पों’पली बजाते हुए. दिल की धड़कन भी तेज थी कि कहीं उसको पता चल गया तो छड़ी लेकर पीछे भागेगा. हिम्मत करके उसके पास गया और नोट को दोलड़ा (मोड़कर) करके असली वाला ऊपर दिखाकर बोला,
“राजू, दो कुल्फी दे दो.”
उसने नोट को देखकर कहा, “ये नहीं चलेगा. पता नहीं कहां से लाया है.”
दिल बैठने लगा कि कहीं उसे पता न चल जाए कि असली नकली का जोड़ है इसलिए तपाक से बोला, “रात को दीये में तेल डाल रहा था इसलिए नोट पर गिर गया. बाकी फटा हुआ तो बिलकुल नहीं है देख लो.”
उसे शायद इस बात का अनुमान नहीं था कि उसके साथ शारारत हो रही है इसीलिए उसने एक नजर नोट पर डाली और बड़बड़ाते हुए नोट जेब में डाल लिया. कसम से जग जीतने जैसी खुशी हासिल हुई. उसने जैसे ही कुल्फी दी तुरन्त बाकी के छुट्टे लेकर घर की तरफ भाग लिया कि कहीं पीछे से आवाज न दे दे. ऐसी थी राजू कुल्फीवाले के साथ मेरी पहली शरारत.

हालांकि अब जब भी वो बात याद आती है तो अफसोस होता है कि राजू के साथ वैसा नहीं करना चाहिए था पर बचपन में जो शरारत हम न कर गुजरें वो कम ही है.

मैं आज जब भी गांव जाता हूं तो राजू कुल्फी वाले को देखकर सोचता हूं कि उसमें और हममें क्या अंतर है. वह आज भी अपनी एक जैसी जिन्दगी जी रहा है और हम पता नहीं बेहतर जिन्दगी की तलाश में न जाने कहां कहां भटक रहे हैं. उसके जीवन में मैंने संतोष की एक झलक देखी है.

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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मारवाड़ी और गुजराती

एक गुजराती ने मारवाड़ी को अपना कुआँ बेचा।

लिखा पढ़ी और पैसे के लेन देन के बाद अगले दिन गुजराती ने मारवाड़ी से मिला और बोला :

“मैंने तुमको सिर्फ कुआँ बेचा है, उसका पानी नहीं। अगर पानी भी चाहिए तो, पानी की कीमत अलग से देनी होगी।”

इस पर मारवाड़ी बोला :

“अरे, मैं खुद तुमसे ही मिलने आ रहा था, ये बोलने के लिए कि, कुएँ में जो तुम्हारा पानी है उसे, दो दिन में निकालकर ले जाओ, नहीं तो मेरे कुएँ में पानी रखने का तुम्हें, किराया देना पड़ेगा।”

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